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….तो इस लिए कानपुर से नाम फाइनल नहीं कर पा रहे हैं अखिलेश

कानपुर। यूपी में कहावत है कि जिस दल ने मजदूरों के शहर पर कब्जा किया, उसी की सरकार दिल्ली में बनती है। इसी के कारण कानपुर की सीट को वीआइपी का दर्जा मिला हुआ है। आजादी के बाद से अधिकतर समय यहां पंजे का दबदबा रहा, लेकिन राममंदिर आंदोलन के बाद बीजेपी का ये अभेद किला हो गया। प्रियंका गांधी के राजनीति में एंट्री के बाद सपा प्रमुख एक्शन में आ गए हैं। वर्तमान हालात ये हैं कि कद्दावर नेता को चुनाव में उतारा जाएगा।

ब्राम्हण चेहरे पर लगा सकते दांव
बसपा के साथ गठबंधन होने के बाद सपा प्रमुख को कानपुर में जीत की दिख रही है और इसी के चलते अभी यहां से उन्होंने प्रत्याशी के नाम का ऐलान नहीं किया। कांग्रेस का एक कद्दावर नेता सपा प्रमुख से संपर्क बनाए हुए है। वो 2019 में अपनी पत्नी को साइकिल का सिंबेल दिला चुनाव में उतार सकते हैं। सपा पदाधिकारियों के साथ बैठक के बाद अखिलेश यादव ने कानपुर सीट पर कब्जे के लिए पदाधिकारियों को जुट जाने का आदेश दिया। पार्टी से जुड़े नेताओं की मानें तो सपा सपा यहां से ब्राम्हण चेहरे को लगभग-लगभग टिकट दिए जाने का मन चुकी है।

लखनऊ में बैठक कर टटोली नब्ज
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लखनऊ में कानपुर के पदाधिकारी और दावेदारों के साथ लगातार बैठक कर रहे हैं। संगठन सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश ने बारी बारी से दावेदारों, विधायकों, शहर अध्यक्ष, पूर्व अध्यक्ष आदि को अकेले में बुलाकर मन टटोला। पूछा कि कानपुर में क्या परिस्थिति बन रही है और कौन प्रत्याशी बेहतर हो सकता है। सभी ने अपने अपने हिसाब से समीकरण समझाए। व्यक्तिगत मुलाकात के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सार्वजनिक रूप से कहा कि आप लोग चुनाव की तैयारी में जुटे रहें। प्रत्याशी वही होगा, जो पूरी तरह जातीय समीकरणों के हिसाब से जिताऊ होगा। उन्होंने ये भी इशारा किया कि भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी घोषित होने के बाद हम समीकरणों पर और विचार कर सकते हैं।

इन्हें बुलाया लखनऊ
अखिलेश से मुलाकात करने वाले दावेदारों में उद्योगपति और युवा नेता प्रभाकर पांडेय, वरिष्ठ नेता केके शुक्ला, पूर्व विधायक महेश वाल्मीकि, रतन गुप्ता, कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला की भाभी मधु शुक्ला और युवा नेता अभिमन्यु गुप्ता थे। सूत्रों के मुताबिक इनमें मधु शुक्ला और अभिमन्यु का नाम बाद में शामिल कराया गया। पहले यह दावेदारों में नहीं थे। गौर करने लायक है कि गठबंधन के समीकरण में सपा से अब तक कोई भी मुस्लिम दावेदार सामने नहीं आया है। ऐसे में माना जा रहा है कि सपा ब्राह्मण या वैश्य पर दांव लगा सकती है। बतादें, कानपुर सीट में करीब छह लाख ब्राम्हण, ढाई लाख मुस्लिम औक्र इतने ही दलित वोटर्स हैं। पार्टी ब्राम्हण चेहरे को उतार कर कांग्रेस के बजाए भाजपा के खिलाफ ख्ुद को खड़ा करने के लिए रणनीति बनाई है।

7 बार कांग्रेस यहां से जीती
आजादी के बाद से अब तक कानपुर संसदीय सीट पर 17 बार चुनाव हो चुके हैं। कांग्रेस इस सीट पर महज 6 बार जीत का परचम लह रहा चुकी है, बाकी 11 बार निर्दलीय और बीजेपी सहित अन्य पार्टियों ने जीत हासिल की है। यहां से सपा व बसपा ने कभी जीत दर्ज नहीं की। 2014 के चुनाव में डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने कांग्रेस के पूर्व मं.ी श्रीप्रकाश जायसवाल को चुनाव में करारी शिकस्त दी। समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार चौथे स्थान पर रहा था, जबकि बसपा तीसरे स्थान पर रही।

जिताऊ उम्मीदवार को टिकट
सपा प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ने कहा कि कानपुर में पार्टी हाईकामान जिताऊ कैंडीडेट को टिकट देगी। शनिवार को बैठक के दौरान पदाधिकारियों से जमीनी हकीकत के बारे में जानकारी ली। पार्टी की स्थित अन्य दलों के मुकाबले अच्छी है। पार्टी ने विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था। कैंट में हमने कांग्रेस के समर्थन दिया, जिसके चलते उनका प्रत्याशी जीता था। बसपा के साथ आने के बाद हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। मजदूरों के शहर में 2019 में साइकिल दौड़ेगी। सोशल मीडिया में वायरल सूची को सपा प्रदेश अध्यक्ष ने फर्जी बताते हुए इसे भाजपा की साजिस करार दिया

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