
News Jungal Desk: नींद में बच्चा कुनमुनाया. हाथ रखा तो शरीर तप रहा था. पट्टियां देना शुरू किया, लेकिन देह तपती ही रही. पास में न कोई दवा, न पैसे. आधी रात में भी गर्म हवा चल रही थी. घुप अंधेरे में, पॉलिथीन की फरफराती छत के नीचे पहली बार सोचा- क्या लौटकर हमसे भूल हो गई! पहले मजहब के नाम पर हमसे भेद होता है .
धूप में पककर तांबई हो चुके हाथ मुझसे बात करते हुए साथ-साथ लाल मिर्चियां तोड़ रहे हैं. पड़ोस के गांव से काम मिला. एक सूप मिर्च के डंठल तोड़ने पर 5 रुपये मिलता है उसी से काम चलाते है .
बताते हुए वे खटाखट उसका ऊपरी हिस्सा अलग कर रही हैं. छींक से बचने के लिए नाक पर कपड़ा बंधा हुआ.
ये आशादेवी हैं. साल की शुरुआत में एक धार्मिक जत्थे के साथ इनका परिवार भी पाकिस्तान Pakistan से आकर जोधपुर में बस गया. शहर से बाहर चोखां के उस हिस्से में, जहां बीते महीनेभर से बांस की बल्लियां और चादरें ही इनका घर हैं. पति रोज सुबह कमाने निकलते हैं. कभी सीमेंट, चावल की बोरियां उठाने का काम मिलता है, कभी वो भी नहीं. हां. अब ठीक है. पूरे महीने बुखार रहा. अस्पताल गए तो पहचान मांगी. हमारे पास न आधार कार्ड है, न वोटर कार्ड. पाकिस्तानी पासपोर्ट है. वो दिखाते तो धकियाकर भगा दिया जाता है ।हम मिन्नतें करते रहे. अपना नाम बताया. खालिस हिंदू. खूब रोए-धोए. लेकिन किसी ने बेटे को नहीं देखा. थककर दुकान से दवा ले आए. बुखार चढ़ता-उतरता रहा.असल मुसीबत रात में आती, जब वो जोरों से रोने लगता. झोपड़ी तो देख रही हैं हमारी! पीठ सीधी करके चल नहीं सकते. बिजली है नहीं. अंधेरे में पत्थरों पर सांप-बिच्छू टहलते रहते है ।कइयों के साथ हादसा हो चुका.पीठ झुकाए-झुकाए ही बच्चे को सीने से लगाए टहलाती रहती, जब तक वो थककर चुप न हो जाए. पहली बार था, जब रात में इनकी सुबकी सुनी. तीन दिनों से खाली लौट रहे थे. खाने को पैसे नहीं. जो गहना लेकर आए थे, वो इस जमीन के नकली पट्टे के लिए दे चुके है ।
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